Chapter 8 · Verse 1
Reference BG8.1
अर्जुन उवाच | किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम | अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ||८-१||
arjuna uvāca . kiṃ tad brahma kimadhyātmaṃ kiṃ karma puruṣottama . adhibhūtaṃ ca kiṃ proktamadhidaivaṃ kimucyate ||8-1||
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।।8.1।। अर्जुन ने कहा -हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है? तथा कर्म क्या है? और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है? तथा अधिदैव नाम से क्या कहा जाता है,
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A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
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Arjuna inquired: O my Lord, O Supreme Person, what is Brahman? What is the self? What are fruitive activities? What is this material manifestation? And what are the demigods? Please explain this to me.
Dr.S.Sankaranarayan
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Shri Purohit Swami
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Sri Abhinav Gupta
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Sri Ramanuja
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Sri Shankaracharya
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Swami Adidevananda
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Swami Gambirananda
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Swami Sivananda
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A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
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In this chapter Lord Kṛṣṇa answers different questions from Arjuna, beginning with “What is Brahman?” The Lord also explains karma (fruitive activities), devotional service and yoga principles, and devotional service in its pure form. The Śrīmad-Bhāgavatam explains that the Supreme Absolute Truth is known as Brahman, Paramātmā and Bhagavān. In addition, the living entity, the individual soul, is also called Brahman. Arjuna also inquires about ātmā, which refers to body, soul and mind. According to the Vedic dictionary, ātmā refers to the mind, soul, body and senses also. Arjuna has addressed the Supreme Lord as Puruṣottama, Supreme Person, which means that he was putting these questions not simply to a friend but to the Supreme Person, knowing Him to be the supreme authority able to give definitive answers.
Swami Sivananda
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Swami Sivananda
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Sri Shankaracharya
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Sri Shankaracharya
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।।8.1।। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नम् इत्यादि वचनोंसे ( पूर्वाध्यायमें ) भगवान्ने अर्जुनके लिये प्रश्नके बीजोंका उपदेश किया था अतः उन प्रश्नोंको पूछनेके लिये अर्जुन बोला --, हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्मतत्त्व क्या है अध्यात्म क्या है कर्म क्या है अधिभूत किसको कहते हैं अधिदैव किसको कहते हैं हे मधुसूदन इस देहमें अधियज्ञ कौन है और कैसे है तथा संयतचित्तवाले योगियोंद्वारा आप मरणकालमें किस प्रकार जाने जा सकते हैं।
Swami Ramsukhdas
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।।8.1 -- 8.2।। अर्जुन बोले -- हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत किसको कहा गया है? और अधिदैव किसको कहा जाता है? यहाँ अधियज्ञ कौन है और वह इस देहमें कैसे है? हे मधूसूदन ! नियतात्मा (वशीभूत अंतःकरण वाले) मनुष्यके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं?
Swami Tejomayananda
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।।8.1।। अर्जुन ने कहा -हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है? तथा कर्म क्या है? और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है? तथा अधिदैव नाम से क्या कहा जाता है,
Swami Chinmayananda
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Swami Chinmayananda
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।।8.1।। No commentary.
Swami Ramsukhdas
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।।8.1।। व्याख्या--'पुरुषोत्तम किं तद्ब्रह्म'-- हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है अर्थात् ब्रह्म शब्दसे क्या समझना चाहिये''किमध्यात्मम्'-- अध्यात्म शब्दसे आपका क्या अभिप्राय है'किं कर्म' -- कर्म क्या है अर्थात् कर्म शब्दसे आपका क्या भाव है'अधिभूतं च किं प्रोक्तम्' -- आपने जो अधिभूत शब्द कहा है उसका क्या तात्पर्य है'अधिदैवं किमुच्यते' -- अधिदैव किसको कहा जाता है'अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्' -- इस प्रकरणमें अधियज्ञ शब्दसे किसको लेना चाहिये। वह,अधियज्ञ इस देहमें कैसे है'मधुसूदन प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः' -- हे मधुसूदन जो पुरुष वशीभूत अन्तःकरणवाले हैं अर्थात् जो संसारसे सर्वथा हटकर अनन्यभावसे केवल आपमें ही लगे हुए हैं उनके द्वारा अन्तकालमें आप कैसे जाननेमें आते हैं अर्थात् वे आपके किस रूपको जानते हैं और किस प्रकारसे जानते हैं सम्बन्ध -- अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुनके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देते हैं।
Sri Abhinav Gupta
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Sri Abhinav Gupta
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।।8.1 -- 8.2।।ते ब्रह्म तद्विदुः इत्यादिना यत् भगवता उपक्षिप्तं तत् प्रश्ननवकपूर्वकं (S पूर्वं) निर्णयति ( निर्णाययति N निर्वर्णयति) --किं तद् ब्रह्मेति। अधियज्ञ इति। अधियज्ञः कथम् [कश्च] कोऽत्र देहे तिष्ठति इति शेषः।
Sri Anandgiri
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Sri Anandgiri
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।।8.1।।सप्तमाध्यायान्तेयेषां त्वन्तगतं पापम् इत्यादिना येषां ब्रह्मादीनामनुसंधानमुक्तं यच्च प्रयाणकाले भगवतः स्मरणं दर्शितं तदिदं जिज्ञासमानः सन्पृच्छतीति प्रश्नसमुदायमवतारयति -- ते ब्रह्मेति। प्रश्नबीजानि तद्विषयभूतानि ब्रह्मादीनि वस्तूनीति यावत्। बुभुत्सितविषयप्रतिलम्भानन्तरं तेषां प्रश्नद्वारा निर्णयार्थमाह -- अत इति। यदुक्तं ते ब्रह्म तद्विदुरिति तत्किं सोपाधिकं निरुपाधिकं वा ब्रह्मशब्दस्योभयत्रापि संभवादिति मत्वाह -- किं तदिति। यच्चोक्तं कृत्स्नमध्यात्ममिति तत्रात्मानं देहमधिकृत्य तस्मिन्नधिष्ठाने तिष्ठतीत्यध्यात्मशब्देन श्रोत्रादिकरणग्रामो वा प्रत्यग्भूतं ब्रह्मैव वा विवक्षितमित्याह -- किमध्यात्ममिति।विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च इति श्रुतौ कर्मणो द्वैविध्यनिर्धारणात्कर्म चाखिलमित्यत्र कीदृक्कर्म गृहीतमिति पृच्छति -- किमिति। क्षराक्षराभ्यां कार्यकारणाभ्यामतीतस्य भगवतो न किंचिद्वेद्यमस्तीति सूचयति -- पुरुषोत्तमेति। साधिभूताधिदैवमित्यत्राधिभूतशब्देन पृथिव्यादिषु भूतेषु वर्तमानं किंचिदेव गृह्यते किंवा समस्तमेव कार्यमिति निर्दिधारयिषया पृच्छति -- अधिभूतमिति। अधिदैवमिति च दैवतविषयमनुध्यानं वा दैवतेष्वादित्यमण्डलादिषु वर्तमानं चैतन्यं वा जिघृक्षितमिति प्रश्नान्तरं प्रस्तौति -- अधिदैवमिति।
Sri Dhanpati
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Sri Dhanpati
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।।8.1।।सप्तमाध्यायान्ते ते ब्रह्म तद्विदुरित्यादिसार्धेनार्जुनस्य प्रश्नबीजानि भगवतोक्तानि अतस्तत्प्रश्नार्थमर्जुन उवाच -- किमित्यादिना। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्त्रमिति यदुक्तं तत्किं सगुणमुत निर्गुणं। ब्रह्मशब्दस्योभयत्रापि संभवात्। यच्चोक्तं कृत्स्त्रमध्यात्ममिति तत्रात्मानं देहमधिकृत्य तस्मिन्नाधिष्ठाने तिष्ठतीत्यध्यात्मशब्देन किं त्वगादीन्द्रियसमुदायो विवक्षित उत प्रत्यगात्मैव।विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च इति श्रुतौ कर्मद्वैविध्यश्रवणात्कर्म चाखिलमित्यत्रापि कीदृक्वकर्म विवक्षितं किं लौकिकमुत वैदिकं यज्ञादि रुपं। पुरुषोत्तमस्य न किंचिदज्ञातमिति सूचयन्नाह -- पुरुषोत्तमेति। अधिभूतं च किं प्रोक्तं भूतेष्वाकाशादिषु वर्तमानं किंचिदेव गृह्यते उत सर्वमेव कार्यं। अधिदैवं किमुच्यते किं देवताविषयमनुध्यानमुतादित्यमण्डलादिषु वर्तमानं चैतन्यम्।
Sri Jayatritha
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Sri Jayatritha
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।।8.1 -- 8.2।।अध्यायस्यावान्तरप्रतिपाद्यमर्थमाह -- मरणेति। गम्यत इति गतिः। आदिपदेन मार्गादिकम्। मरणकालकर्तव्यं च गतिश्च ते आदी यस्य तत्तथोक्तम्। कर्तव्यस्मरणविषयत्वगम्यत्वादिरूपो भगवन्महिमैव वर्ण्यत इति षट्कान्तर्भावसिद्धिः। उक्तव्याख्यानपूर्वकमिति चोपस्कर्तव्यम् तेनानन्तर्यलक्षणाऽपि सङ्गतिः सिद्धा तत्प्रसङ्गेनैव मरणकालकर्तव्याद्युपदेशात्।
Sri Madhavacharya
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Sri Madhavacharya
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।।8.1 -- 8.2।।नमः श्रीमते कृष्णाय। ँ़ मरणकालकर्त्तव्यगत्याद्यस्मिन्नध्याय उपदिशति।
Sri Madhusudan Saraswati
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Sri Madhusudan Saraswati
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।।8.1।। , चतुर्षु भगवत्प्रियेष्वपि मतोऽधिकं यः प्रभोरुदारपदतः परः समचकार तं मामयम्।परोपनिषदर्थदैरमलवाक्यदीपैस्तमो निवार्य परमं भजे तमिह काशिराजं गुरुम्।।पूर्वाध्यायान्तेते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् इत्यादिना सार्धश्लोकेन सप्त पदार्था ज्ञेयत्वेन भगवता सूत्रितास्तेषां वृत्तिस्थानीयोऽयमष्टमोऽध्याय आरभ्यते। तत्र सूत्रितानि सप्त वस्तूनि विशेषतो बुभुत्समानः श्लोकाभ्यामर्जुन उवाच -- तत् ज्ञेयत्वेनोक्तं ब्रह्म किं सोपाधिकं निरुपाधिकं वा एवमात्मानं देहमधिकृत्य तस्मिन्नधिष्ठाने तिष्ठतीत्यध्यात्मं किं श्रोत्रादिकरणग्रामो वा प्रत्यक्चैतन्यं वा तथा कर्म चाखिलमित्यत्र किं कर्म यज्ञरूपमन्यद्वाविज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च इति श्रुतौ द्वैविध्यश्रवणात्। तव मम च समत्वात्कथं त्वं मां पृच्छसीति शङ्कामपनुदन्सर्वपुरुषेभ्य उत्तमस्य सर्वज्ञस्य तव न किंचिदज्ञेयमिति संबोधनेन सूचयति हे पुरुषोत्तमेति। अधिभूतं च किं प्रोक्तं पृथिव्यादिभूतमधिकृत्य यत्किंचित्कार्यमधिभूतपदेन विवक्षितं किं वा समस्तमेव कार्यजातम्। चकारः सर्वेषां प्रश्नानां समुच्चयार्थः। अधिदैवं किमुच्यते देवताविषयमनुध्यानं वा सर्वदैवतेष्वादित्यमण्डलादिष्वनुस्यूतं चैतन्यं वां।
Sri Neelkanth
Sanskrit Commentary
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Sri Neelkanth
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।।8.1।।पूर्वस्मिन्नध्याये मायोपहितं ब्रह्म जगत्कारणमुक्तंतच्चोत्तमानामनुपाधिब्रह्मप्रतिपत्तावुपलक्षणं मध्यमानामुपास्यं चेति मत्वा प्रतिपत्तव्यं ब्रह्म तद्विषय एकः उपासनाविषयाश्च षट् एवं सप्त प्रश्नविषयास्ते ब्रह्म तद्विदुरित्यध्यायान्ते सार्धश्लोकेन भगवता सूत्रितास्तद्वृत्तिरूपोऽयमध्याय आरभ्यते। तत्र सूत्रितानां ब्रह्मादिशब्दानामर्थं बुभुत्सुरर्जुन उवाच। किं तत्कृत्स्नं ब्रह्मेति प्रथमः प्रश्नः। शेषः स्पष्टार्थः श्लोकः।
Sri Purushottamji
Sanskrit Commentary
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Sri Purushottamji
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।।8.1।।पूर्वोक्तब्रह्मकर्मादिरूपजिज्ञासुरर्जुनः। पृष्टवान् स्पष्टमेतस्य कृष्ण उत्तरमुक्तवान्।।1।।पूर्वाध्यायान्ते भगवताते ब्रह्म [7।29] इत्यादिना समपदार्थज्ञानमुक्तं भक्तानाम् तत्स्वरूपजिज्ञासुरर्जुनः प्रभुं विज्ञापयामास -- अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्मेति द्वयेन। हे पुरुषोत्तम तद्ब्रह्म यदुक्तं तत्किम् अध्यात्मं किं कर्म किं च पुनः अधिभूतं किं प्रोक्तं च पुनः अधिदैवं किमुच्यते अधियज्ञः यज्ञाधिष्ठाता फलदाता कः। अत्र उक्तप्रकारेषु कथं केन प्रकारेण नियतात्मभिरनन्यैकपरिचित्तैर्ज्ञेयोऽसि। हे मधुसूदन सर्वानिष्टनिवर्तक अस्मिन् देहे प्रयाणकाले अन्तकाले कथं केन प्रकारेण ज्ञेयोऽसि। अत्रायं भावः -- पुरुषोत्तमेति सम्बोधनेन त्वमेव पुरुषोत्तमः त्वत्तः पराभावात्। कथं तद्ब्रह्मेत्युक्तम् आधिदैविकं तु त्वत्स्वरूपमेव अतस्त्वत्तोऽन्याधिदैवं किम् अध्यात्मादयस्तु৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷. हीना एव तेषां ज्ञानं किं प्रयोजनकम् सेवा च कथं कार्या इत्यादिव्यञ्जितम्। मधुसूदनेति सम्बोधनेन त्वदीयानां मरणादिभयाभावे तत्समये त्वं कथं स्वज्ञानमुक्तवानिति ज्ञापितमिति भावः।
Sri Ramanuja
Sanskrit Commentary
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Sri Ramanuja
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।।8.1।।अर्जुन उवाच -- जरामरणमोक्षाय भगवन्तम् आश्रित्य यतमानानां ज्ञातव्यतया उक्तं तद् ब्रह्म अध्यात्मं च कर्म च किम् इति वक्तव्यम् ऐश्वर्यार्थिनां ज्ञातव्यम् अधिभूतम् अधिदैवं च किं त्रयाणां ज्ञातव्यः अधियज्ञशब्दनिर्दिष्टश्च कः तस्य च अधियज्ञभावः कथं प्रयाणकाले च एभिः त्रिभिः नियतात्मभिः कथं ज्ञेयः असि।
Sri Shankaracharya
Sanskrit Commentary
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Sri Shankaracharya
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।।8.1 -- 8.2।। --,ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नम् (गीता 7।29) इत्यादिना भगवता अर्जुनस्य प्रश्नबीजानि उपदिष्टानि। अतः तत्प्रश्नार्थम् अर्जुनः उवाच -- एषां प्रश्नानां यथाक्रमं निर्णयाय श्रीभगवानुवाच --,श्रीभगवानुवाच --,
Sri Sridhara Swami
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Sri Sridhara Swami
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।।8.1।।ब्रह्मकर्माधिभूतादि विदुः कृष्णैकचेतसः। इत्युक्तं ब्रह्मकर्मादि स्पष्टमष्टम उच्यते।।1।।पूर्वाध्यायान्ते भगवतोपक्षिप्तानां ब्रह्माध्यात्मादिसप्तानां पदार्थानां तत्त्वं जिज्ञासुरर्जुन उवाच -- किं तद्ब्रह्मेति द्वाभ्याम्। स्पष्टोऽर्थः।
Sri Vallabhacharya
Sanskrit Commentary
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Sri Vallabhacharya
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।।8.1।।ब्रह्मकर्मादिकं प्राज्ञैर्विज्ञेयं नास्मदादिभिः। इति जिज्ञासया �
Vedantadeshikacharya Venkatanatha
Sanskrit Commentary
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Vedantadeshikacharya Venkatanatha
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।।8.1।।सङ्गतिदर्शनायाह -- सप्तम इति।परस्य ब्रह्मणो वासुदेवस्योपास्यत्वमिति -- मय्यासक्तमनाः [7।1] इत्यादेरथः तत्रैव ह्युपासनं प्रस्तुतम्। तच्छेषतया चान्यत्सर्वमिहोच्यते। तस्यैव प्रपञ्चनम्अहं सर्वस्य प्रभवः [10।8]वासुदेवः सर्वं [7।19]चतुर्विधा भजन्ते माम् [7।16] इत्यादिभिः परस्तात्क्रियत इति भावः।परस्येत्यादिभिरुपहितब्रह्मव्योमातीतादिपक्षप्रतिक्षेपः। ब्रह्मशब्दस्य विशेषशब्दसमभिव्याहाराद्देवतान्तरव्यावृत्तिः। वासुदेवशब्देनात्रावतारविशेषो वा विवक्षितः।निखिलेत्यादिभिरुपास्यत्वपरब्रह्मत्वोपयुक्ताकारकथनम्।निखिलचेतनाचेतनवस्तुशेषित्वमितिभूमिरापः [7।4] इत्यादेः श्लोकद्वयस्यार्थः। निखिलशब्देन कार्यकारणादिरूपावस्थासङ्ग्रहात् कार्यभूतब्रह्मरुद्रादेरपि क्रोडीकारः। कारणत्वम्एतद्योनीनि [7।6] इति श्लोकस्यार्थः।मत्तः परतरं नान्यत् [7।7] इत्युक्तस्य परत्वस्यमामेभ्यः परम् [7।13] इत्यत्रोपयुक्ततया तत्रैवोदाहर्तुमत्र तदतिक्रमेणमयि सर्वम् [7।7] इत्याद्युक्ताधारत्वोपादानम्।रसोऽहम् [7।8] इत्यादिसामानाधिकरण्यफलितं सर्वशब्दवाच्यत्वम्। तत्र हेतुराधारत्वादिविशेषसिद्धं सर्वशरीरकत्वम्। एवं शेषित्वाद्यनुवादेन वक्ष्यमाणतत्तदधिकारिप्राप्यवस्तुविशेषसामानाधिकरण्यस्यापि शरीरात्मभावहेतुकत्वं दर्शितम्।मत्त एवेति तान्विद्धि [7।12] इत्यादिषु प्रवृत्तितादधीन्यस्यापि विवक्षितत्वात्सिद्धं सर्वनियन्तृत्वम्।सवश्चेत्यनेनानिर्दिष्टानामन्येषां च आभिप्रायिकाणां सङ्ग्रहः।तस्यैवेत्यवधारणेननान्यत्किञ्चिदस्ति [7।7] इत्यस्यार्थ उक्तः।त्रिभिर्गुणमयैः [7।13] इति श्लोकस्य सार्धस्यार्थःसत्त्वेत्यादिनोक्तः।मामेव [7।14] इत्याद्युक्तप्रपत्तेः सुकृतविशेषहेतुकत्वम्।जनाः सुकृतिनः [7।16] इत्यनेन दर्शितमाहअत्युत्कृष्टसुकृतेति।न मां दुष्कृतिनः [7।15] इत्यादेः पूर्वोक्ततिरोधानप्रकारविशेषकथनरूपत्वात्सुकृतिप्रशंसाशेषत्वाच्च तदर्थोऽत्र पृथङ्गोपात्तः।चतुर्विधाः [7।16] इत्यादिकंसुकृततारतम्येनेत्यादिनाऽनुसंहितम्। उपासकभेदं चेत्यन्वयः।तेषां ज्ञानी [7।17] इत्यादेः श्लोकद्वयस्यार्थोभगवन्तमित्यादिनोक्तः।बहूनां जन्मनाम् [7।19] इत्यादिनासर्गे यान्ति परन्तप [7।27] इत्यन्तेन सिद्धमाहदुर्लभत्वमिति।येषां तु [7।28] इत्यादेरध्यायशेषस्य अर्थमाह -- एषां त्रयाणामिति। ज्ञातव्यमिह सिद्धरूपं विवक्षितम्।उपादेयं अनुष्ठेयम्। एतेनस्वयाथात्म्यम् [गी.सं.11] इत्यादिसङ्ग्रहश्लोकस्यार्थोऽपि प्रपञ्चितः। अयं त्वष्टमस्य सङ्ग्रहःऐश्वर्याक्षरयाथात्म्यभगवच्चरणार्थिनाम्। वेद्योपादेयभावानामष्टमे भेद उच्यते [गी.सं.12] इति। अत्र भेदोक्तेरध्यायार्थत्वात्स्वरूपप्रस्तावः प्रागेव कृत इति दर्शितम्।,प्रस्तुतप्रपञ्चनमिति सङ्गतिमाह -- इदानीमिति। जीवस्वरूपादिज्ञातव्यस्योपासनाद्यनुष्ठेयस्य च भेदजिज्ञासयाऽर्जुन उवाच -- किं तदिति।आर्तो जिज्ञासुः [7।16] इत्यादिना प्रागेवाधिकारित्रयस्योक्तत्वात्जरामरणमोक्षाय [7।29] इत्यादिषु यच्छब्दावृत्तिसामर्थ्यादर्थस्वभावाच्चाधिकारिभेदस्तेषां ज्ञातव्योपादेयवस्तुप्रतिनियमश्चार्जुनेन ज्ञातः तत्रैव विशेषबुभुत्सयाऽय प्रश्नः। वक्ष्यते च विशेषः। ततश्चकिं तद्ब्रह्म इत्यर्धमक्षरयाथात्म्यार्थिविषयम् अधिभूते च इत्यर्धमैश्वर्यार्थिविषयम्अधियज्ञः इति श्लोकस्तु अर्थस्वभावात् त्रयाणां साधारण इति विविनक्ति -- जरामरणेति। कथमिति प्रकारप्रश्नेअधियज्ञभाव इत्यर्थलब्धम्।अत्र इत्येतच्छब्दः शास्त्रसन्निध्युपाधिकः तच्चोत्तरग्रन्थे व्याख्यास्यति -- अत्र इन्द्रादौ मम देहभूते इति।अस्मिन् इतीदंशब्दस्तु स्वप्रत्यक्षसन्निध्युपाधिकः प्रत्यक्षा हीन्द्रादयोऽपि प्रष्टुरर्जुनस्य। एतच्छब्देदंशब्दयोश्चैकस्मिन्वाक्ये सामानाधिकरण्येन प्रयोगो दृश्यते -- स एष द्वाभ्यां दर्शनीभ्यां विराड्भ्यामनयोर्द्वाविंशयोर्द्विवचनयोरयं पुरुषः प्रतिष्ठितः इत्यादौ। यद्वाअत्र इति यज्ञस्वरूपपरामर्शः नियतात्मत्वं त्रयाणामपेक्षितम् अत्र बहुवचनमधिकारित्रयपरमित्यभिप्रायेणोक्तम् -- एभिस्त्रिभिरिति।