Chapter 10 · Verse 21
Reference BG10.21
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् | मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ||१०-२१||
ādityānāmahaṃ viṣṇurjyotiṣāṃ raviraṃśumān . marīcirmarutāmasmi nakṣatrāṇāmahaṃ śaśī ||10-21||
Among the (twelve) Adityas, I am Vishnu; among luminaries, the radiant sun; I am Marichi among the (seven or forty-nine) Maruts; among stars the moon am I.
।।10.21।। मैं (बारह) आदित्यों में विष्णु और ज्योतियों में अंशुमान् सूर्य हूँ; मैं (उनचास) मरुतों (वायु देवताओं) में मरीचि हूँ और नक्षत्रों में शशी (चन्द्रमा) हूँ।।
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A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
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Of the Ādityas I am Viṣṇu, of lights I am the radiant sun, of the Maruts I am Marīci, and among the stars I am the moon.
Dr.S.Sankaranarayan
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Of the sons of Aditi, I am Visnu; of the luminaries, the radiant Sun; of the Maruts, I am Marici; of the stars, I am the Moon.
Shri Purohit Swami
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Of all the creative Powers I am the Creator, of luminaries the Sun; the Whirlwind among the winds, and the Moon among planets.
Sri Abhinav Gupta
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Sri Ramanuja
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Of Adityas, who are twelve in number, I am the twelfth Aditya, called Visnu, who is paramount. Of luminuous bodies, namely, among luminaries in the world, I am the sun, the most brilliant luminary. Of Maruts I am the paramount Marici. Of constellations, I am the moon. The genitive case here is not to specify one out of many included in a group. Its use is the same as what is exemplifed in the statement 'I am the consciousness in all beings' (10.22). I am the moon who is the Lord of the constellations.
Sri Shankaracharya
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Adityanam, among the twelve Adityas; aham, I; am the Aditya called Visnu. Jyotisam, among the luminaries; amsuman, the radiant; ravih, sun. Marutam, among the different gods called Maruts; asmi, I am; the one called Marici. Naksatranam, among the stars; I am sasi, the moon.
Swami Adidevananda
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Of Adityas I am Visnu, of luminous bodies I am the radiant sun. Of the Maruts I am Marici, and among the constellations I am the moon.
Swami Gambirananda
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Among the Adityas [viz Dhata, Mitra, aryama, Rudra, Varuna, Surya, Bhaga, Vivasvan, Pusa, Savita, Tvasta and Visnu.-Tr.] I am Visnu; among the luminaries, the radiant sun; among the (forty-nine) Maruts [The seven groups of Maruts are Avaha, Pravaha, Vivaha, Paravaha, Udvaha, Samvaha and parivaha.-Tr.] I am Marici; among the stars I am the moon.
Swami Sivananda
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Among the (twelve) Adityas, I am Vishnu; among luminaries, the radiant sun; I am Marichi among the (seven or forty-nine) Maruts; among stars the moon am I.
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
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There are twelve Ādityas, of which Kṛṣṇa is the principal. Among all the luminaries shining in the sky, the sun is the chief, and in the Brahma-saṁhitā the sun is accepted as the glowing eye of the Supreme Lord. There are fifty varieties of wind blowing in space, and of these winds the controlling deity, Marīci, represents Kṛṣṇa. Among the stars, the moon is the most prominent at night, and thus the moon represents Kṛṣṇa. It appears from this verse that the moon is one of the stars; therefore the stars that twinkle in the sky also reflect the light of the sun. The theory that there are many suns within the universe is not accepted by Vedic literature. The sun is one, and as by the reflection of the sun the moon illuminates, so also do the stars. Since Bhagavad-gītā indicates herein that the moon is one of the stars, the twinkling stars are not suns but are similar to the moon.
Swami Sivananda
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Swami Sivananda
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आदित्यानम् among the Adityas? अहम् I? विष्णुः Vishnu? ज्योतिषाम् among lights? रविः the sun? अंशुमान् radiant? मरीचिः Marichi? मरुताम् of the Maruts (winds)? अस्मि (I) am? नक्षत्राणाम् among the stars? अहम् I? शशी the moon.Commentary Of the twelve Adityas I am the Aditya known as Vishnu? Dhata? Mitra? Aryama? Rudra? Varuna? Bhaga? Surya? Vivasvan? Pusham? Savita? Tvashta and Vishnu are the twelve Adityas. The twelve months of the year are the Adityas.The Maruts are the gods controlling the winds. Some hold that there are seven of them while others say there are fortynine.The twelve Adityas? the luminaries like Agni? lightning? etc.? the Maruts? the stars? etc.? are the Samanya Vibhutis (ordinary manifestations) of the Lord. Vishnu? the sun? Marichi? and the moon are His Visesha Vibhutis (special manifestations) and hence they have greater splendour in them.You can superimpose the Lord on the sun and the moon? and meditate on them as forms of the Lord. You can practise the same kind of meditation on all forms mentioned in the following verses of this chapter.
Sri Shankaracharya
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Sri Shankaracharya
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।।10.21।।तथा इस प्रकार भी मेरा ध्यान किया जा सकता है --, द्वादश आदित्योंमें मैं विष्णु नामक आदित्य हूँ। प्रकाश करनेवाली ज्योतियोंमें मैं किरणोंवाला सूर्य हूँ। वायुसम्बन्धी देवताओंके भेदोंमें मैं मरीचि नामक देवता हूँ और नक्षत्रोंमें मैं शशी -- चन्द्रमा हूँ।
Swami Ramsukhdas
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Swami Ramsukhdas
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।।10.21।। मैं अदितिके पुत्रोंमें विष्णु (वामन) और प्रकाशमान वस्तुओंमें किरणोंवाला सूर्य हूँ। मैं मरुतोंका तेज और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ।
Swami Tejomayananda
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।।10.21।। मैं (बारह) आदित्यों में विष्णु और ज्योतियों में अंशुमान् सूर्य हूँ; मैं (उनचास) मरुतों (वायु देवताओं) में मरीचि हूँ और नक्षत्रों में शशी (चन्द्रमा) हूँ।।
Swami Chinmayananda
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Swami Chinmayananda
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।।10.21।। मैं आदित्यों में विष्णु हूँ वैदिक परम्परा में आदित्यों का संख्या कहीं पाँच तो कहीं छ बतायी गई है। ये अदिति के पुत्र थे। तत्पश्चात् पारम्परिक विश्वास के अनुसार इनकी संख्या बारह मानी गई? जो बारह मासों के सूचक हैं। विष्णु पुराण के अनुसार विष्णु नामक एक आदित्य है? जो अन्य आदित्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण है।मैं ज्योतियों में सूर्य हूँ आधुनिक भौतिक विज्ञान भी सूर्य को समस्त ऊर्जाओं के स्रोत के रूप में स्वीकार करता है। अत भगवान् के कथन का अभिप्राय स्वत स्पष्ट हो जाता है। जहाँ कहीं भी कोई ऊर्जा व्यक्त होती है? उसका स्रोत आत्मा ही है।मैं वायु देवताओं में मरीचि हूँ वायु के अधिष्ठाता देवता मरुत कहलाते हैं? जिनकी संख्या उनचास कही गई है। इन में मरीचि नामक मरुत मैं हूँ। मरुतगण रुद्र पुत्र माने गये हैं। ऋग्वेद के अनुसार मरीचि उनमें प्रमुख है। मैं नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ भारतीय खगोलशास्त्र में जिस अर्थ में नक्षत्र शब्द प्रयुक्त किया जाता है? वह चन्द्रमा के मार्ग के तीन तारों का सूचक है। इस दृष्टि से? विश्व में चन्द्रमा का यह मार्ग भगवान् की विभूति की ही एक अभिव्यक्ति है और चन्द्रमा उनमें सर्वश्रेष्ठ है? क्योंकि वह नियन्त्रक और नियामक है तथा तेज में भी अपूर्व है।परन्तु हम नक्षत्र शब्द से सामान्य प्रचलित अर्थ को भी स्वीकार कर सकते हैं? जिसके अनुसार रात्रि के समय आकाश में जड़े हुए छोटेछोटे चमकते हुए असंख्य तारे ही नक्षत्र हैं। कुछ व्याख्याकार एक पग आगे जाकर कहते हैं कि नक्षत्र शब्द रात्रि के समस्त प्रकाशों का सूचक है। चिन्तन के लिए उपयोगी होने से यह अर्थ भी स्वीकार्य हो सकता है। रात्रि के समय एक छोटी सी कुटिया से लेकर संसद भवन तक को चमकाने वाले चन्द्रमा का प्रकाश शीतल शान्तिप्रद और गौरवमय होता है। ठीक उसी प्रकार आत्मा का प्रकाश भी अतुलनीय है।यहाँ बाइस श्लोकों की इस मालिका में? भगवान् श्रीकृष्ण कुल पचहत्तर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य ज्ञानयोग के मार्ग पर चलने वाले साधक की सहायता करना है। यहाँ उक्त उपासनाओं के द्वारा साधकगण अपने मनबुद्धि को सुगठित करके चित्त की एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं। ध्यान के लिए उपयोगी ये पचहत्तर अभ्यास हैं
Swami Ramsukhdas
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Swami Ramsukhdas
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।।10.21।। व्याख्या--'आदित्यानामहं विष्णुः'--अदितिके धाता, मित्र आदि जितने पुत्र हैं? उनमें 'विष्णु' अर्थात् वामन मुख्य हैं। भगवान्ने ही वामनरूपसे अवतार लेकर दैत्योंकी सम्पत्तिको दानरूपसे लिया और उसे अदितिके पुत्रों-(देवताओँ-) को दे दिया (टिप्पणी प0 556.2)। 'ज्योतिषां रविरंशुमान्' -- चन्द्रमा, नक्षत्र, तारा, अग्नि आदि जितनी भी प्रकाशमान चीजें हैं, उनमें किरणों-वाला सूर्य मेरी विभूति है; क्योंकि प्रकाश करनेमें सूर्यकी मुख्यता है। सूर्यके प्रकाशसे ही सभी प्रकाशमान होते हैं।'मरीचिर्मरुतामस्मि' -- सत्त्वज्योति, आदित्य, हरित आदि नामोंवाले जो उनचास मरुत हैं, उनका मुख्य तेज मैं हूँ। उस तेजके प्रभावसे ही इन्द्रके द्वारा दितिके गर्भके सात टुकड़े करनेपर और उन सातोंके फिर सात-सात टुकड़े करनेपर भी वे मरे नहीं प्रत्युत एकसे उनचास हो गये।'नक्षत्राणामहं शशी' -- अश्विनी, भरणी, कृत्तिका आदि जो सत्ताईस नक्षत्र हैं, उन सबका अधिपति चन्द्रमा मैं हूँ।इन विभूतियोंमें जो विशेषता -- महत्ता है, वह वास्तवमें भगवान्की है। [इस प्रकरणमें जिन विभूतियोंका वर्णन आया है, उनको भगवान्ने विभूतिरूपसे ही कहा है, अवताररूपसे नहीं; जैसे-- अदितिके पुत्रोंमें वामन मैं हूँ (10। 21), शस्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ (10। 31), वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव (कृष्ण) और पाण्डवोंमें धनञ्जय (अर्जुन) मैं हूँ (10। 37) इत्यादि। कारण कि यहाँ प्रसङ्ग विभूतियोंका है।]
Sri Abhinav Gupta
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Sri Abhinav Gupta
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।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
Sri Anandgiri
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Sri Anandgiri
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।।10.21।।उक्तध्यानाशक्तेभ्यो व्यस्तं विभूतियोगमुपदिशति -- एवंचेति। तत्र तत्र प्रधानत्वेन परस्य ध्येयत्वम्। एवंशब्दार्थमेव दर्शयति -- आदित्यानामित्यादिना।
Sri Dhanpati
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Sri Dhanpati
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।।10.21।।एवमात्मनो योगमुक्त्वा तत्र तत्र ध्येया विभूतीराह। आदित्यानां विष्णुः शकोऽर्यमा धाता त्वष्टा पूषा विवस्वान् सविता मित्रो वरुणः अंशो भगश्चत्युक्तानां द्वादशानां विष्णुर्नामादित्योऽहम्। वामनावतारो वेति व्याख्यानस्यापि विष्णुर्नामदित्यो वामनावतारोऽहमित्यर्थावगमेनाचार्योक्तव्याख्यानान्तर्भूतत्वाद्वेत्युक्तिरपार्था। यद्वा अरुणः सूर्यो भानुस्तपनश्चन्द्रमा मित्रो हिरण्यवीर्यो रविरर्यमा गभस्तिर्दिवाकारो विष्णुरित्युक्तानामादित्यानां विष्णुरित्यभिप्रायोणाचार्यैरेवमुक्तमिति बोध्यम्। प्रकाशयितृ़णां जगद्य्वपी रश्मिवान्सूर्यः। मरुतां देवता भेदानां मरीचिनामास्मि। नक्षत्राणामधिपतिश्चन्द्रोऽहमस्मि।
Sri Jayatritha
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Sri Jayatritha
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।।10.21।।द्विविधं विभूतिरूपं प्रत्यक्षं तिरोहितं च अत्र विष्ण्वादिकं प्रत्यक्षमिति ज्ञापयितुं तच्छब्दान्व्याकुर्वन्आदित्यानामहं विष्णुः इति विष्णुशब्दं तावत्सप्रमाणकं व्याकरोति -- विष्णुरिति। सर्वेति? योग्यतया सम्बध्यते।आदिपदेन वक्ष्यमाणार्थसङ्ग्रहः। चशब्दो धात्वन्तरसमुच्च्यार्थः। गच्छन्त्यनेनेति गतिः। भूतानां पृथिव्यादीनां प्रजानां ब्रह्मादीनाम्।वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु [धा.पा.2।38] इत्यतो गत्यर्थात् क्स्नुप्रत्ययो धातोर्ह्रस्वश्च। मे मया? रोदसी द्यावापृथिव्यौ? व्याप्तौ व्याप्तेविष्लृ व्याप्तौ [धा.पा.3।13] इत्यतः क्नुः? कान्तिः कमनीयतावश कान्तौ [धा.पा.2।70] इत्यतो नुः धातोरकारस्येकारः? शकारस्य षकारः।वी गति इत्यतो वा,कान्तिकर्मणः क्स्नुः। अधिभूतं प्राग्व्याख्यातम्।विश प्रवेशने [धा.पा.6।143] इति? अतः क्नुः षत्वं च। तदिच्छुरधिभूतस्य जन्मादीच्छुः। कान्तिरिच्छा। अतो वयतेर्वष्टेश्च पूर्ववद्रूपम्। क्रमणात् त्रिविक्रमरूपेण पादविक्षेपात्। पूर्ववद्वयतेर्गत्यर्थात्कर्तरि प्रत्ययः।
Sri Madhavacharya
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Sri Madhavacharya
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।।10.21।।विष्णुः सर्वव्यापित्वप्रवेशित्वादेः।विष्लृ व्याप्तौ? विश् प्रवेशने इति पठन्ति।गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि (प्रजनश्चास्मि) भारत व्याप्तौ मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम। आधिभूतनिविष्टश्च तदिच्छुश्चा -- (तद्विश्वं चा)स्मि भारत। क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसंज्ञितः [म.भा.12।341।42?43] इति मोक्षधर्मे।
Sri Madhusudan Saraswati
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।।10.21।।एतदशक्तेन बाह्यानि ध्यानानि कार्याणीत्याह यावदध्यायसमाप्ति -- आदित्यानां द्वादशानां मध्ये विष्णुर्विष्णुनामादित्योऽहं? वामनावतारो वा। ज्योतिषां प्रकाशकानां मध्येऽहं रविरंशुमान्विश्वव्यापी प्रकाशकः। मरुतां सप्तसप्तकानां मध्ये मरीचिनामाहम्। नक्षत्राणामधिपतिरहं शशी चन्द्रमाः। निर्धारणे षष्ठी। अत्र प्रायेण निर्धारणे षष्ठी। क्वचित्संबन्धेऽपि यथा भूतानामस्मि चेतनेत्यादौ। वामनरामादयश्चावताराः सर्वैश्वर्यशालिनोऽप्यनेन रूपेण ध्यानविवक्षया विभूतिषु पठ्यन्ते। वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मीति तेन रूपेण ध्यानविवक्षया स्वस्यापि स्वविभूतिमध्ये पाठवत्। अतः परं च प्रायेणायमध्यायः स्पष्टार्थ इति क्वचित्किंचिद्व्याख्यास्यामः।
Sri Neelkanth
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।।10.21।।योगमुक्त्वा विभूतीराह -- आदित्यानामित्यादिना यावदध्यायसमाप्ति। आदित्यानां द्वादशानां मध्ये विष्णुनामादित्योऽहं? वामनावतारो वा। ज्योतिषामग्न्यादीनां मध्ये रविः अंशुमान् अत्यन्तं प्रतपनशीलो निदाघमध्याह्ने तीव्रातपवान्रविरहमेवेत्यर्थः। मरुतां सप्तसप्तकानां मध्ये मरीचिरहम्। नक्षत्राणां ताराणाम्। अत्र प्रायेण निर्धारणे षष्ठी। भूतानामस्मि चेतनेत्यादौ संबन्धेऽपि। शशी चन्द्रमाः।
Sri Purushottamji
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।।10.21।।योगयुक्ता विभूतीः कथयति -- आदित्यानामित्यारभ्य यावदध्यायसमाप्ति। आदित्यानां द्वादशानां मध्ये विष्णुः व्यापकधर्मात्मको बिम्बप्रकाशकोऽहं ज्योतिषां बहिर्जगत्प्रकाशकानां मध्ये अंशुमान् सर्वप्रकाशकरश्मियुक्तो रविः सूर्योऽस्मीत्यर्थः। मरुतां वायूनां मध्ये मरीचिर्नाम कश्चन सर्वसुखोत्पादनरूपो वायुरस्मि। नक्षत्राणां मध्ये शशी चन्द्रोऽस्मि।शशी इति नाम्ना रोहिण्यासक्तिजलाञ्छनवत्त्वेन रसात्मकासक्तिधर्मरूपशृङ्गाररसात्मकत्वं व्यञ्जितम्।
Sri Ramanuja
Sanskrit Commentary
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Sri Ramanuja
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।।10.21।।द्वादशसंख्यासंख्यातानाम् आदित्यानां द्वादशो य उत्कृष्टो विष्णुः नाम आदित्यः सः अहम् ज्योतिषां जगति प्रकाशकानां यः अंशुमान् रविः आदित्यगणः सः अहम्? मरुताम् उत्कृष्टो मरीचिः यः सः अहम् अस्मि? नक्षत्राणाम् अहं शशी। न इयं निर्धारणे षष्ठी?भूतानाम् अस्मि चेतना इतिवत् नक्षत्राणां पतिः यः चन्द्रः सः अहम् अस्मि।।
Sri Shankaracharya
Sanskrit Commentary
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Sri Shankaracharya
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।।10.21।। --,आदित्यानां द्वादशानां विष्णुः नाम आदित्यः अहम्। ज्योतिषां रविः प्रकाशयितृ़णाम् अंशुमान् रश्मिमान्। मरीचिः नाम मरुतां मरुद्देवताभेदानाम् अस्मि। नक्षत्राणाम् अहं शशी चन्द्रमाः।।
Sri Sridhara Swami
Sanskrit Commentary
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।।10.21।।इदानीं विभूतीः कथयति -- आदित्यानामित्यादिना यावदध्यायसमाप्ति। आदित्यानां द्वादशानां मध्ये विष्णुर्वामनोऽहम्। ज्योतिषां प्रकाशानां मध्येंऽशुमान्विश्वव्यापकरश्मियुक्तो रविः सूर्योऽहम्। मरुतां देवविशेषाणां मध्ये मरीचिनामाहमस्मि। यद्वा सप्त मरुद्गणा वायवस्तेषां मध्य इति। ते च आवहः? प्रवहः? विवहः? परावहः? उद्वहः? संवहः? परिवह इति मरुद्गणाः। नक्षत्राणां मध्ये चन्द्रोऽहम्। अत्र चआदित्यानामहं विष्णुः इत्यादिषु प्रायशो निर्धारणे षष्ठी। क्वचिच्चभूतानामस्मि चेतना इत्यादिना संबन्धे षष्ठी। तच्च तत्र तत्रैव दर्शयिष्यामः। विष्णुरित्याद्यवतारोऽपि प्रभावातिशयमात्रविवक्षया विभूतित्वेन निर्दिश्यते। अतः परं चाध्यायस्य स्पष्टार्थत्वेऽपि क्वचित्किंचिद्व्याख्यास्यामः।
Sri Vallabhacharya
Sanskrit Commentary
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Sri Vallabhacharya
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।।10.21।।इदानीं विभूतिमाह -- आदित्यानामित्यादिना। द्वादशानां मध्ये विष्णुनामाऽऽदित्योऽहम्। आदित्यानां देवानामेव वामन इति केचित्। ज्योतिषां प्रकाशभूतानां मध्येंऽशुमान् रविरहम्। मरुतां देवानामुत्कृष्टो यो मरीचिः सोऽहम्। नक्षत्राणामहं शशीति। अथ सर्वत्र प्रायेणेति निर्द्धारणे षष्ठी? क्वचित् निर्द्धारणे सम्बन्धे च षष्ठी विज्ञातव्या? यथाभूतानामस्पि चेतना [10।22] इत्यादौ।
Vedantadeshikacharya Venkatanatha
Sanskrit Commentary
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Vedantadeshikacharya Venkatanatha
Sanskrit Commentary
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।।10.21।।आदित्यानामहं विष्णुः इत्युपक्रम्ययच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन [10।39] इत्यन्तं सामानाधिकरण्यप्रघट्टकंअहमात्मा [10।20] इति श्लोकेन सङ्गमयन्नवतारयति -- एवं भगवत इति। एतेनअहमात्मा इत्यादिकाः समस्ताश्चतस्रो विभूतय इति मतान्तरं निरस्तम्।विभूतिविशेषानिति? प्राधान्यत इति ह्युपक्रान्तम्। ननु शरीरवाचिनः शरीरादिशब्दा नात्मनि पर्यवस्यन्ति तस्मादत्रापीति लक्षणास्वीकार एव न्याय्यः न शक्तिकल्पना? लाघवाच्चेत्यत्राह -- भगवतीति। हिशब्दो हेत्वर्थः। अपृथक्सिद्धविशेषणवाचिनः शब्दास्तत्तद्द्वारा धर्मिण्यपि मुख्यवृत्ता इति प्रयोजकरूपेण गुणादिष्वपि सिद्धत्वान्न शक्तिकल्पनागौरवमिति भावः। तदेतदुक्तंपर्यवस्यन्तीति। शरीरवाचिशब्दानां स्वरसतस्तत्तदात्मनि पर्यवसानमपृथक्सिद्ध्युपाधिकं दर्शयति -- यथेति। शरीरादिशब्दास्तु गुण इत्यादिशब्दवन्निष्कर्षकशब्दत्वान्न धर्मिणि पर्यवस्यन्ति। एतदभिप्रायेणोक्तंदेवो मनुष्यः पक्षी वृक्ष इत्यादयः शब्दा इति। अध्यासादिहेतुकसामानाधिकरण्यशङ्कामपनयतिभगवतस्तत्तदात्मतयेति। नह्युपक्रमोपसंहारविरुद्धोऽर्थो मध्ये स्वीकार्यः न च ब्रह्मणः सर्वहेयमयत्वं भ्रमाद्वा तत्त्वतो वाऽङ्गीकर्तुं युक्तमिति भावः।अविनाभाववचनादिति आत्मना विना हि शरीरभूतं न भवतीति भावः।अग्निना विना धूमो नास्ति गुणिना विना गुणो नास्ति इत्युक्ते अग्न्यादिरेव परमार्थः धूमादिस्तु मिथ्याभूत इति वा? अग्न्याद्यात्मक इति वा प्रत्ययो हि न भवति तद्वदत्रापि इति। ननुयज्ञदत्तं विनाऽन्ये गृहे न सन्तिरज्जुं विना सर्पादिकं नास्ति इत्युक्ते यथैकस्यैव सत्त्वं तदतिरिक्तानां चासत्त्वं प्रतीयते? तद्वदत्रापि किं न स्यात् इत्यत्राहअविनाभावश्चेति। असञ्जातविरोधिकालसमुदितोपक्रमविरुद्धतया उपसंहारस्य नोदय इत्युपक्रमाधिकरणसिद्धमिति भावः।नियम्यतयेत्यनेन धूमाग्निव्याप्तिवैषम्यमपि दर्शितम्।,एवमेतावता ग्रन्थेनअहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः [10।20] इति सर्वशरीरवर्तिनां जीवानां ब्रह्मस्वरूपैक्यमुच्यत इति कुदृष्टिमतमुन्मूलितम्। आदित्यानां अदित्यपत्यानाम्।अजघन्यो जघन्यः इत्यादिवचनानुसारेणद्वादशो य उत्कृष्ट इत्युक्तम्। अत्र चोत्तरेषु च निर्धारणार्थविशेषप्रदर्शनार्थ उत्कृष्टशब्दः। स चपुरोधसां च मुख्यं मां [10।24] इति वक्ष्यमाणमुख्यपर्यायतया अपेक्षितप्रदेशे सर्वत्र निहितः। अत्र चोद्ध्रियमाणानां पदार्थानां केषाञ्चित्प्राधान्यं प्रत्यक्षम् केषाञ्चिदागमिकम्। क्वचिदव्यवहितं? क्वचिज्जीवव्यवहितं च सामानाधिकरण्यम्। ज्योतिश्शब्देन तारकामात्रग्रहणे ततो बहिर्भूतस्य तत्सम्बन्धरहितस्य तस्य च रवेर्निर्धारणाद्ययोगात्प्रकाशकानामिति सामान्येनोक्तम्। जगत्कारणभूतपरज्योतिरपेक्षया रवेः खद्योतकल्पत्वात्तद्व्यवच्छेदायजगतीति विशेषितम्।अंशुमान् इति निर्धारणौपयिकातिशयितप्रकाशयोगो मतुपा विवक्षितः? अन्यथा पौनरुक्त्यात्। रविशब्दस्य द्वादशादित्यसाधारणत्वादेकवचनं समुदायाभिप्रायमिति प्रदर्शनायोक्तंआदित्यगण इति। मरुतो वायव एकोनपञ्चाशद्दितिपुत्राः? येषां सप्तकाः सप्त गणा भवन्ति। शशिनोऽपि यदि नक्षत्रत्वं स्यात्? तदा हि तस्माद्वर्गात्तस्य निर्धारणमित्यभिप्रायेणाहनेयमिति। कस्तर्ह्यत्रार्थः इत्यत्राह -- नक्षत्राणां पतिरिति।प्राधान्यतः इति ह्युपक्रान्तमिति भावः।ननु पूर्वापरेषु सर्वेषु निर्धारणार्थेषु मध्ये कस्यचित्सम्बन्धमात्रपरत्वमयुक्तम् नक्षत्रशब्देन निशि प्रकाशमात्रं छत्रिन्यायाद्ग्राह्यम्? सुकृतां वा एतानि ज्योतींषि यन्नक्षत्राणि [यजुः5।4।1।3] इति श्रुतेश्चन्द्रमण्डलस्यापि वा स्वर्गिणां भोगस्थानत्वान्नक्षत्रत्वं यो वा इह यजते अमुं स लोकं न क्षते तन्नक्षत्राणां नक्षत्रत्वं देवगृहा वै नक्षत्राणि [यजुः1।5।2।10] इति तत्राह -- भूतानामस्मि चेतनेतिवदिति। मुख्ये सम्भवति लक्षणा न न्याय्या? नचात्र सर्वत्र निर्धारणार्थताभूतानामस्मि चेतना